दो जवां दिलों का ग़म दूरियां समझती हैं

इस बार की मेरी पसंद है अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की गायी ये गजल जिसे हमने गीत पहली -१ में पहचानने को पूछा था। इसका सही जवाब दिया कबाड़खाने के कबाड़ी अशोक पांडे जी ने।

अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की गजलों में मुझे जो सबसे ज्यादा पसंद आता है वो है इन दोनों भाइयों के गाने का अंदाज। कुछ लाईन एक अकेली आवाज में, फिर दो आवाजें इकट्ठे और फिर अकेली अकेली, इससे जो लय बनती है वो सुनने लायक होती है। ‘दो जवाँ दिलों का गम’ की दूसरी खासियत है इस गजल के बोल (शेर), जरा बानगी देखिये - “कौन याद करता है हिचकियाँ समझती हैं’ या फिर ‘फूल कौन तोड़ेगा डालियाँ समझती हैं’ या सीढ़ियों से हसीनों के उतरने पर कहा जाता है ‘जिस्म की नजाकत को सीढ़ियाँ समझती हैं’।

मेरे पास यहाँ इसका कवर नही है इसलिये अगर आपमें से अगर कोई बता सकता है तो बताईयेगा कि ये गजल किसकी लिखी हुई है। अब आप इस गजल का मजा लीजिये।

[शिरीषजी, समीरजी, ताऊ रामपुरिया और अशोक आप सभी को धन्यवाद।]

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Comments

हमने तो पहली बार सुना और पसंद भी आया । खास कर इसका संगीत बहुत ही मधुर लगा ।

vakai achhi gajal hai……aor kahi ek ladki vaali bhi khoob hai.

TUM TO KHUD HI KATIL HO…TUM YE BAAT KYA JANO…!

Most beautiful line of this song!

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