बस और नहीं

Date May 15, 2007 | Kuhu

नहीं, बस और नहीं बुलाऊंगी मैं
कहूँ, तुम याद नहीं आते तो झूठी कहलाऊंगी मैं।
हर बार बह जाते हैं गुस्सैल लहरों में
अब रेत घर नहीं बनाऊँगी मैं।

तुम भी तो कभी बढ़ाओ पहला कदम
अब न पहल कर पाऊँगी मैं।
कह दो तुम्हें नहीं है इंतज़ार मेरा
ये झूठ तो न कह पाऊँगी मैं।

कतरा भर ज़िन्दगी जीभर जी लूँ ज़रा
गर और मिली तो ख़ुशी से मर ही जाऊंगी मैं।
क्यों हो तुम खामोश खड़े
आ जाओ, आ भी जाओ, अब न चल पाऊँगी मैं।

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9 Responses to “बस और नहीं”

  1. ghughutibasuti said:

    तुम भी तो कभी बढ़ाओ पहला कदम
    अब न पहल कर पाऊँगी मैं।
    अच्छा लिखा है आपने !
    घुघूती बासूती

  2. समीर लाल said:

    बढ़िया लिखा है. लिखते रहो. बधाई.

  3. Kuhu said:

    घुघूती,

    धन्यवाद। :)

    समीर,

    आपको भी धन्यवाद। :)

  4. अनूप शुक्ल said:

    अच्छा लिखा! आगे लिखना जारी रखें!

  5. संजय बेंगाणी said:

    सुन्दर.

  6. Divyabh said:

    मन के कोने से यह आवाज आती है
    खड़ी हो राह में वह कहीं और कुछ कह डालू आज
    जब सामने मिल जाती है वह कभी तो देखता ही रह जाता हूँ…।
    बहुत सुंदर लिखा है…प्रेम का सच्चा प्रसंग उभरता दिख रहा है…।

  7. saheli said:

    Beautiful poem.

  8. सारथी: काव्य अवलोकन 3 : सारथी said:

    […] तुम भी तो कभी बढ़ाओ पहला कदमअब न पहल कर पाऊँगी मैं।कह दो तुम्हें नहीं है इंतज़ार मेराये झूठ तो न कह पाऊँगी मैं। [पूरी कविता पढें …] […]

  9. अतुल शर्मा said:

    बहुत सुंदर कविता।

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