आमने-सामनेः तरकश के तीर “संजय” बनाम दुनिया “अमित” की नजर से
July 18, 2008 | Tarun
आमने-सामने के एपिसोड ४ में आज सवालों के जवाब देने के लिये आमने सामने हैं - तरकश के तीर “संजय” और दुनिया मेरी नजर से के “अमित”। अगर आप पहली बार इसे पढ़ने आये हैं तो जरूर सोच रहे होंगे ये भला क्या है? तो आपको ये सब इन लिंकों से पता चल जायेगा। आमने-सामने के बार में जानने के लिये यहाँ क्लिक कीजिये।
आमने-सामने एपिसोड 1: फुरसतिया बनाम उड़नतश्तरी
आमने-सामने एपिसोड 2: पंगेबाज बनाम दुर्योधन की डायरी
आमने-सामने एपिसोड 3: घुघूती बासुती बनाम लावण्या जी
अब शुरू करते हैं सवाल-जवाबों का सिलसिला और लेते हैं इन दो चिट्ठाकारों के मजेदार जवाबों का लुत्फ।
प्रश्न १: हिंदी ब्लोगिंग कंटेंट के मामले में अभी अपरिपक्व या बहुत पीछे है, इसके बारे में आपकी क्या राय है?
संजय: परिपक्व होना ही कौन चाहता है? आपको मालूम ही है की हर परिपक्व सोचता है काश आज भी बच्चे होते, क्या मजे थे अपरिपक्वता के.
हिन्दी चिट्ठाकारी को जितना समय हुआ है इससे और क्या उम्मीद रखी जा सकती? फिर लोगो का रूझान पिछले एक दो साल से ही इस ओर ज्यादा बना है, पहले तो हिन्दी को इस क्षेत्र में बढ़ाने के अभियान के तहत लिखा जाता था, शौक तो अब बना है. और स्थिति सुधर भी रही है.
आप हिन्दी और अंग्रेजी के अखबार देखें दोनो के कंटेट में कितना अंतर है, वही ब्लॉग पर भी नजर आता है. अभिरूची का मामला है. एक दो साल में परिपक्व चिट्ठाकारी देखने को मिलेगी मगर होलिवुड-बोलिवुड जैसा अंतर बना रहेगा.
यह तो भाषण हो गया
आगे बढ़ें तो ठीक रहेगा….
अमित: “बहुत पीछे” जब आप कह रहे हैं तो इसका अर्थ आप किसी अन्य भाषा की ब्लॉगिंग से तुलना कर रहे हैं, और यह तो आप बताए नहीं कि किस भाषा से तुलना कर रहे हैं!! बिना ऐसे बताए कैसे जवाब दें जी? क्या पता आप कल को किसी भी तरह की ब्लॉगिंग के साथ तुलना में इसको लगा दें और फिर कोई डंडा मारने की गरज से मेरे पीछे पड़ गया तो तब साड्डा की होगा??!!
वैसे मैं कुछ-२ समझ रहा हूँ तो आपका इशारा अन्य लोगों की तरह अंग्रेज़ी ब्लॉगिंग से तुलना की ओर ही लगता है। यदि ऐसा है तो ही मेरा यह उत्तर वैध है अन्यथा नहीं।
जैसा कि कुछ ब्लॉगर बंधु समझते हैं वैसा बिलकुल नहीं है, अंग्रेज़ी ब्लॉगिंग पूर्णतया साफ़ सुथरी या “बढ़िया” वाली कैटेगरी में नहीं आती, गंद वहाँ भी मिलेगा। लेकिन फर्क यह है कि अंग्रेज़ी ब्लॉगर हिन्दी ब्लॉगरों की तुलना में काफ़ी अधिक संख्या में हैं इसलिए भिन्न विषयों का ज्ञान रखने वाले बहुत हैं इसलिए भिन्न-२ विषय आधारित ब्लॉग कई हैं। एक ही विषय पर भी यदि कई लोग लिख रहे हैं तो आपको काफ़ी माल भिन्न मत वाला मिल जाएगा, हालांकि वह आपको छांटना पड़ेगा क्योंकि एक ही राग आलापते भी बहुत से मिलेंगे और एक दूसरे की नकल(चोरी नहीं) करते भी बहुत मिलेंगे।
हिन्दी में भी भिन्न तरह के ब्लॉग आ रहे हैं, बहुत से पहले से ही हैं, लेकिन चूंकि संख्या अभी कम है इसलिए अधिक वैरायटी नहीं है। इस समय चिट्ठाजगत और नारद ऐसे एग्रीगेटर हैं जो कि सबसे अधिक हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेट कर रहे हैं; मौजूदा आंकड़ों के अनुसार साढ़े तीन हज़ार ब्लॉग से थोड़े अधिक, यानि कि अभी हिन्दी ब्लॉगिंग को बहुत आगे जाना है, यह तो मात्र शुरुआती दौर है।
प्रश्न २: “चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को चांदनी चौक में चांदी की चम्मच से ही क्यों चटनी चटायी”, जरा खुलासा करेंगे कारणों में प्रकाश डालें।
संजय: चम्मचों के सदा चाँदी ही चाँदी होती रही है ऐसे में चम्मच चाँदी का ही होना चाहिए था. ताकि “च च” का अनुप्राष रचे और लोग इस घटना को सदा याद रखे.
इसमें चाचा की ट्रीक भी हो सकती है, महंगाई के जमाने में बिजली के बल्ब तले पूरी सब्जी खिलाने से अच्छा है आसमाँ तले, चाँदनी में चटनी चटा दो, चम्मच भले ही उधार का हो.
अमित: अरे वह तो चंदू के चाचा से पूछो क्योंकि चटनी तो वे ही चटाए रहे, या फिर चंदू की चाची से पूछो क्योंकि वे चाटे रही। कोई बड़ी बात नहीं कि ये सब चंदू द्वारा ही फिक्स किया गया हो इसलिए उसको भी थाम लो और फिर इंटेरोगेट करो। बाकी रही प्रकाश डालने की बात तो वह तो सूर्यदेव, बल्ब/ट्यूब आदि का कार्यक्षेत्र है, और मेरा नाम तो सूरज(या सूर्य का कोई अन्य उपनाम) भी नहीं है, और आपने वो कहावत नहीं सुनी - “जिसका काज उसी को साझे” वाली!!
वैसे आपको प्रकाश कहीं मिले तो बताना, घर में रद्दी इकट्ठी हो रही है, कमबख्त 2 महीने से नहीं आया, आए तो रद्दी उस पर डलवाई जाए….. मतलब उसको दी जाए!!
प्रश्न ३: “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, जैसे…”, अपने शब्दों में बतायें कैसा लगा?
संजय: एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, जैसे…पहले भी इन्हे कहीं देखा है.
हा हा हा..वैसे एक बार एक लड़की को देखा तो अच्छा लगा था, अब उन्हे रोज़ देखना पड़ता है और तब से किसी अन्य को देखने की सम्भावना भी खत्म हो गई है.
अमित: ही ही ही….. यह तो लड़की को देख के ही बताया जा सकता है ना, अब हर लड़की एक जैसी तो होती नहीं!!
इसलिए पहले लड़की दिखाईये फिर बताएँगे कि कैसा लगा!!
प्रश्न ४: फुरसतिया यानि अनुप जी का प्रश्न है - आपकी एक सबसे अच्छी आदत क्या है जिसे आप तुरंत छोड़ना चाहेंगे और कोई खराब आदत जिसे हमेशा बनाये रखना चाहेंगे?
संजय: अच्छी आदत छोड़ने के बारे में बताने के लिए पहले सोचना पड़ेगा की कोई अच्छी आदत है भी क्या? अरे भाई कोई अच्छी आदत है ही नहीं, अगर चॉकलेट खाना अच्छी आदत में शामिल हो तो उसे छोड़ना चाहूँगा.
खराब आदतों के बारे में जरूर पता है की ये खराब है, अतः बताता हूँ, दो ऐसी आदत है जिनसे सदा चिपका रहना चाहूँगा… एक त्वरित आने वाला क्षणभंगुर गुस्सा और दूसरा हिन्दी के प्रति “दुराग्रह”.
अमित: अच्छी आदत? हुम्म….!! हाँ तो अच्छी आदत जिसे तुरंत छोड़ देना चाहेंगे वह है आलस्य। अब यह अपने लिए अच्छी आदत इसलिए है क्योंकि कभी-२ आलस्य करना भी अच्छा रहता है लेकिन मैं इससे छुटाकारा पाने का प्रयास कर रहा हूँ ताकि भिन्न कार्यों की जो लंबी सूचि बना रखी है वह जल्द से जल्द निपटे।
बुरी आदत? मुझमें? मज़ाक कर रहे हैं? खैर अब आप कह रहे हैं तो बता देता हूँ कि एक बुरी आदत है ज़िद्दी स्वभाव लेकिन इसको मैं हमेशा बनाए रखना चाहूँगा क्योंकि इसको यदि ठीक से नियंत्रित किया जाए तो इस स्वभाव का सदुपयोग भी किया जा सकता है, काफ़ी हद तक इसमें सफ़ल रहा हूँ लेकिन दिल्ली अभी (थोड़ी)दूर है।
हमारी टिप्पणीः लो कर लो बात! दद्दू दिल्ली में खडे होकर कह रहे हैं कि दिल्ली अभी (थोड़ी) दूर है
प्रश्न ५: उडनतश्तरी यानि समीर जी का प्रश्न है - यदि आपको एक कानून बनाने का मौका दिया जाये कि “ऐसा लिखना गैर कानूनी होगा” तो आप क्या या किस विषय पर लिखना गैर कानूनी बनाना चाहेंगे और क्यूँ? कानून का उलंघ्न करने वाले के लिए क्या सजा प्रस्तावित करेंगे?
संजय: विषय को छोड़िये, मैं साधुवादी टिप्पणी को गेरकानुनी घोषित करवाता और उलंघन करने वाले को सौ-सौ टिप्पणियाँ रोज करने की सजा दिलवाता.
क्यों? तो वो इसलिए की हम नहीं कर सकते तो कोई दूसरा कैसे कर सकता है?
अमित: यदि मुझे कानून बनाने का मौका मिले तो मैं बिना वेरीफाई की गई सामग्री को टीवी या अन्य समाचार माध्यमों पर प्रसारित करना अथवा छापना गैरकानूनी कर दूँगा जिससे समाचार माध्यम अंट-शंट बकवास छापना/दिखाना बंद करें।
सज़ा? सज़ा यह होगी कि दोषी पत्रकार/लेखक तथा उसके एडिटर को 30 दिन तक रोज़ 10 अलग-२ कवियों/कवियत्रियों की कुल 50 कविताएँ(प्रतिदिन) सुननी पड़ेंगी और दिन के अंत में परीक्षा देनी होगी जो कि उस दिन सुनी कविताओं पर आधारित होगी। किसी भी दिन फेल होने पर 10 दिन की यही सज़ा बढ़ जाएगी, पास होने पर उनकी सज़ा का एक दिन कम होगा(यानि पहले दिन पास होने पर 29 दिन की सज़ा शेष, फेल होने पर 40 दिन की शेष)।
तो ये था इन दो धुरंधरों चिट्ठाकारों के सवाल जवाब का सिलसिला, आशा है आपको मजा आया होगा। अगर आप भी आमने-सामने में अपने सवाल पूछना चाहते हों हमें readerscafe AT gmail DOT com पर भेज सकते हैं।
अब आप भी अगर इसमें हिस्सा लेना चाहते हैं तो टिप्पणी में वही ईमेल छोड़िये जिसे आप रेगुलर चेक करते हैं और उसके बाद हमारी मेल का करिये इंतजार क्या पता अगले एपिसोड में आप का ही नंबर हो।
Popularity: 49% [?]
Posted in



