July 18, 2008 | Tarun
आमने-सामने के एपिसोड ४ में आज सवालों के जवाब देने के लिये आमने सामने हैं - तरकश के तीर “संजय” और दुनिया मेरी नजर से के “अमित”। अगर आप पहली बार इसे पढ़ने आये हैं तो जरूर सोच रहे होंगे ये भला क्या है? तो आपको ये सब इन लिंकों से पता चल जायेगा। आमने-सामने के बार में जानने के लिये यहाँ क्लिक कीजिये।
आमने-सामने एपिसोड 1: फुरसतिया बनाम उड़नतश्तरी
आमने-सामने एपिसोड 2: पंगेबाज बनाम दुर्योधन की डायरी
आमने-सामने एपिसोड 3: घुघूती बासुती बनाम लावण्या जी
अब शुरू करते हैं सवाल-जवाबों का सिलसिला और लेते हैं इन दो चिट्ठाकारों के मजेदार जवाबों का लुत्फ।
प्रश्न १: हिंदी ब्लोगिंग कंटेंट के मामले में अभी अपरिपक्व या बहुत पीछे है, इसके बारे में आपकी क्या राय है?
संजय: परिपक्व होना ही कौन चाहता है? आपको मालूम ही है की हर परिपक्व सोचता है काश आज भी बच्चे होते, क्या मजे थे अपरिपक्वता के.
हिन्दी चिट्ठाकारी को जितना समय हुआ है इससे और क्या उम्मीद रखी जा सकती? फिर लोगो का रूझान पिछले एक दो साल से ही इस ओर ज्यादा बना है, पहले तो हिन्दी को इस क्षेत्र में बढ़ाने के अभियान के तहत लिखा जाता था, शौक तो अब बना है. और स्थिति सुधर भी रही है.
आप हिन्दी और अंग्रेजी के अखबार देखें दोनो के कंटेट में कितना अंतर है, वही ब्लॉग पर भी नजर आता है. अभिरूची का मामला है. एक दो साल में परिपक्व चिट्ठाकारी देखने को मिलेगी मगर होलिवुड-बोलिवुड जैसा अंतर बना रहेगा.
यह तो भाषण हो गया
आगे बढ़ें तो ठीक रहेगा….
अमित: “बहुत पीछे” जब आप कह रहे हैं तो इसका अर्थ आप किसी अन्य भाषा की ब्लॉगिंग से तुलना कर रहे हैं, और यह तो आप बताए नहीं कि किस भाषा से तुलना कर रहे हैं!! बिना ऐसे बताए कैसे जवाब दें जी? क्या पता आप कल को किसी भी तरह की ब्लॉगिंग के साथ तुलना में इसको लगा दें और फिर कोई डंडा मारने की गरज से मेरे पीछे पड़ गया तो तब साड्डा की होगा??!!
वैसे मैं कुछ-२ समझ रहा हूँ तो आपका इशारा अन्य लोगों की तरह अंग्रेज़ी ब्लॉगिंग से तुलना की ओर ही लगता है। यदि ऐसा है तो ही मेरा यह उत्तर वैध है अन्यथा नहीं।
जैसा कि कुछ ब्लॉगर बंधु समझते हैं वैसा बिलकुल नहीं है, अंग्रेज़ी ब्लॉगिंग पूर्णतया साफ़ सुथरी या “बढ़िया” वाली कैटेगरी में नहीं आती, गंद वहाँ भी मिलेगा। लेकिन फर्क यह है कि अंग्रेज़ी ब्लॉगर हिन्दी ब्लॉगरों की तुलना में काफ़ी अधिक संख्या में हैं इसलिए भिन्न विषयों का ज्ञान रखने वाले बहुत हैं इसलिए भिन्न-२ विषय आधारित ब्लॉग कई हैं। एक ही विषय पर भी यदि कई लोग लिख रहे हैं तो आपको काफ़ी माल भिन्न मत वाला मिल जाएगा, हालांकि वह आपको छांटना पड़ेगा क्योंकि एक ही राग आलापते भी बहुत से मिलेंगे और एक दूसरे की नकल(चोरी नहीं) करते भी बहुत मिलेंगे।
हिन्दी में भी भिन्न तरह के ब्लॉग आ रहे हैं, बहुत से पहले से ही हैं, लेकिन चूंकि संख्या अभी कम है इसलिए अधिक वैरायटी नहीं है। इस समय चिट्ठाजगत और नारद ऐसे एग्रीगेटर हैं जो कि सबसे अधिक हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेट कर रहे हैं; मौजूदा आंकड़ों के अनुसार साढ़े तीन हज़ार ब्लॉग से थोड़े अधिक, यानि कि अभी हिन्दी ब्लॉगिंग को बहुत आगे जाना है, यह तो मात्र शुरुआती दौर है।
प्रश्न २: “चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को चांदनी चौक में चांदी की चम्मच से ही क्यों चटनी चटायी”, जरा खुलासा करेंगे कारणों में प्रकाश डालें।
संजय: चम्मचों के सदा चाँदी ही चाँदी होती रही है ऐसे में चम्मच चाँदी का ही होना चाहिए था. ताकि “च च” का अनुप्राष रचे और लोग इस घटना को सदा याद रखे.
इसमें चाचा की ट्रीक भी हो सकती है, महंगाई के जमाने में बिजली के बल्ब तले पूरी सब्जी खिलाने से अच्छा है आसमाँ तले, चाँदनी में चटनी चटा दो, चम्मच भले ही उधार का हो.
अमित: अरे वह तो चंदू के चाचा से पूछो क्योंकि चटनी तो वे ही चटाए रहे, या फिर चंदू की चाची से पूछो क्योंकि वे चाटे रही। कोई बड़ी बात नहीं कि ये सब चंदू द्वारा ही फिक्स किया गया हो इसलिए उसको भी थाम लो और फिर इंटेरोगेट करो। बाकी रही प्रकाश डालने की बात तो वह तो सूर्यदेव, बल्ब/ट्यूब आदि का कार्यक्षेत्र है, और मेरा नाम तो सूरज(या सूर्य का कोई अन्य उपनाम) भी नहीं है, और आपने वो कहावत नहीं सुनी - “जिसका काज उसी को साझे” वाली!!
वैसे आपको प्रकाश कहीं मिले तो बताना, घर में रद्दी इकट्ठी हो रही है, कमबख्त 2 महीने से नहीं आया, आए तो रद्दी उस पर डलवाई जाए….. मतलब उसको दी जाए!!
प्रश्न ३: “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, जैसे…”, अपने शब्दों में बतायें कैसा लगा?
संजय: एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, जैसे…पहले भी इन्हे कहीं देखा है.
हा हा हा..वैसे एक बार एक लड़की को देखा तो अच्छा लगा था, अब उन्हे रोज़ देखना पड़ता है और तब से किसी अन्य को देखने की सम्भावना भी खत्म हो गई है.
अमित: ही ही ही….. यह तो लड़की को देख के ही बताया जा सकता है ना, अब हर लड़की एक जैसी तो होती नहीं!!
इसलिए पहले लड़की दिखाईये फिर बताएँगे कि कैसा लगा!!
प्रश्न ४: फुरसतिया यानि अनुप जी का प्रश्न है - आपकी एक सबसे अच्छी आदत क्या है जिसे आप तुरंत छोड़ना चाहेंगे और कोई खराब आदत जिसे हमेशा बनाये रखना चाहेंगे?
संजय: अच्छी आदत छोड़ने के बारे में बताने के लिए पहले सोचना पड़ेगा की कोई अच्छी आदत है भी क्या? अरे भाई कोई अच्छी आदत है ही नहीं, अगर चॉकलेट खाना अच्छी आदत में शामिल हो तो उसे छोड़ना चाहूँगा.
खराब आदतों के बारे में जरूर पता है की ये खराब है, अतः बताता हूँ, दो ऐसी आदत है जिनसे सदा चिपका रहना चाहूँगा… एक त्वरित आने वाला क्षणभंगुर गुस्सा और दूसरा हिन्दी के प्रति “दुराग्रह”.
अमित: अच्छी आदत? हुम्म….!! हाँ तो अच्छी आदत जिसे तुरंत छोड़ देना चाहेंगे वह है आलस्य। अब यह अपने लिए अच्छी आदत इसलिए है क्योंकि कभी-२ आलस्य करना भी अच्छा रहता है लेकिन मैं इससे छुटाकारा पाने का प्रयास कर रहा हूँ ताकि भिन्न कार्यों की जो लंबी सूचि बना रखी है वह जल्द से जल्द निपटे।
बुरी आदत? मुझमें? मज़ाक कर रहे हैं? खैर अब आप कह रहे हैं तो बता देता हूँ कि एक बुरी आदत है ज़िद्दी स्वभाव लेकिन इसको मैं हमेशा बनाए रखना चाहूँगा क्योंकि इसको यदि ठीक से नियंत्रित किया जाए तो इस स्वभाव का सदुपयोग भी किया जा सकता है, काफ़ी हद तक इसमें सफ़ल रहा हूँ लेकिन दिल्ली अभी (थोड़ी)दूर है।
हमारी टिप्पणीः लो कर लो बात! दद्दू दिल्ली में खडे होकर कह रहे हैं कि दिल्ली अभी (थोड़ी) दूर है
प्रश्न ५: उडनतश्तरी यानि समीर जी का प्रश्न है - यदि आपको एक कानून बनाने का मौका दिया जाये कि “ऐसा लिखना गैर कानूनी होगा” तो आप क्या या किस विषय पर लिखना गैर कानूनी बनाना चाहेंगे और क्यूँ? कानून का उलंघ्न करने वाले के लिए क्या सजा प्रस्तावित करेंगे?
संजय: विषय को छोड़िये, मैं साधुवादी टिप्पणी को गेरकानुनी घोषित करवाता और उलंघन करने वाले को सौ-सौ टिप्पणियाँ रोज करने की सजा दिलवाता.
क्यों? तो वो इसलिए की हम नहीं कर सकते तो कोई दूसरा कैसे कर सकता है?
अमित: यदि मुझे कानून बनाने का मौका मिले तो मैं बिना वेरीफाई की गई सामग्री को टीवी या अन्य समाचार माध्यमों पर प्रसारित करना अथवा छापना गैरकानूनी कर दूँगा जिससे समाचार माध्यम अंट-शंट बकवास छापना/दिखाना बंद करें।
सज़ा? सज़ा यह होगी कि दोषी पत्रकार/लेखक तथा उसके एडिटर को 30 दिन तक रोज़ 10 अलग-२ कवियों/कवियत्रियों की कुल 50 कविताएँ(प्रतिदिन) सुननी पड़ेंगी और दिन के अंत में परीक्षा देनी होगी जो कि उस दिन सुनी कविताओं पर आधारित होगी। किसी भी दिन फेल होने पर 10 दिन की यही सज़ा बढ़ जाएगी, पास होने पर उनकी सज़ा का एक दिन कम होगा(यानि पहले दिन पास होने पर 29 दिन की सज़ा शेष, फेल होने पर 40 दिन की शेष)।
तो ये था इन दो धुरंधरों चिट्ठाकारों के सवाल जवाब का सिलसिला, आशा है आपको मजा आया होगा। अगर आप भी आमने-सामने में अपने सवाल पूछना चाहते हों हमें readerscafe AT gmail DOT com पर भेज सकते हैं।
अब आप भी अगर इसमें हिस्सा लेना चाहते हैं तो टिप्पणी में वही ईमेल छोड़िये जिसे आप रेगुलर चेक करते हैं और उसके बाद हमारी मेल का करिये इंतजार क्या पता अगले एपिसोड में आप का ही नंबर हो।
Popularity: 19% [?]
Posted in आमने-सामने
7 Comments »
July 11, 2008 | Tarun
आमने-सामने के एपिसोड ३ में आज सवालों के जवाब देने के लिये आमने सामने हैं - लावण्या जी और घुघूती बासुती जी। आज से एक परिवर्तन ये किया है कि नो मोर वोटिंग, सिर्फ और सिर्फ चिट्ठाकारों के मजेदार जवाबों का लुत्फ।
अगर आप पहली बार इसे पढ़ने आये हैं तो जरूर सोच रहे होंगे ये भला क्या है? तो आपको ये सब इन लिंकों से पता चल जायेगा। आमने-सामने के बार में जानने के लिये यहाँ क्लिक कीजिये।
आमने-सामने एपिसोड 1: फुरसतिया बनाम उड़नतश्तरी
आमने-सामने एपिसोड 2: पंगेबाज बनाम दुर्योधन की डायरी
अब शुरू करते हैं सवाल-जवाबों का सिलसिला, जवाब थोड़ा लंबे जरूर हैं, लेकिन हैं मजेदार।
प्रश्न १: आपकी नजर में नारी के सौलह श्रृंगार क्या होने चाहिये?
लावण्याः अब पूरे सोलह गिनवाने पडेँगे क्या !! :-)) अच्छा चलिये, इन्हेँ एक पँक्ति मेँ खडा हुआ देखेँ ..ना कि कौन सा गुण पहले हो और कौन सा बाद मेँ -
१) नारी का सबसे प्रथम आभूषण मृदुता लिये मिठास
२) कोमलता
३) लज्जा
४) शील
५) विनय
६) सौम्यता
७) सादगी
८) शालीनता
९) व्यवहार कुशलता
१०) स्वछता
११) बडा दिल
१२) मुस्कान
१३) खाना बनाने मेँ कुशलता
१४) सँगीत प्रेम
१५) श्रध्धा (अँध श्रध्धा नहीँ! )
१६) सर से पैर तक का सारा बनाव सिँगार
घुघूती बासुतीः सोलह ! कुछ अधिक नहीं हैं क्या ? मुझे तो केवल स्नान,बाल एक चुटिया में गूँथना व उन्हें एक जूड़े में खोंस देना,टैल्क,कोई भी वस्त्र पहन लेना, घर से बाहर जाना है तो साड़ी अपने गिर्द घुमाकर उसमें कैसे तो भी समाना, बिन्दी व बहुत हुआ तो लिपस्टिक लगा लेने का पता है। हाँ कानों व गले में कुछ स्थाई या अस्थाई रूप से टाँगा भी जा सकता है। कितने हो गए ? शेष के बारे में तो आप ही मुझे बताएँ।
हाँ, मैं पुरुष के श्रृंगार के बारे में अधिक बता सकती हूँ। तो भाई, नाक, कान में छेद करवाकर कुछ भी पहन डालिए। मैंने सेफ्टीपिन भी पहने देखा है। बाल कुछ चिपकाऊ तत्व से चिपकाकर उन्हें किसी मॉडर्न आर्ट की शक्ल दे डालिए। शेविंग क्रीम, आफ्टर शेव, पावडर, सुगन्धी, (यह पुरुषों के लिए आवश्यक है,cause they sweat and stink easily !deodourant too will do) टाई आदि से सुसज्जित होइए। यदि युवा हैं तो एक बाइक व हैल्मेट को भी बाहर निकलते समय अपने श्रृंगार का हिस्सा बनाइए। हाँ स्नान को मत भूलिए।
प्रश्न २: “साड़ी बिच नारी है कि नारी बिच साड़ी है, साड़ी ही की नारी है कि नारी ही कि साड़ी है”, स्कूल के दौरान हम क्या समझे थे याद नही, आज आप अपने तरीके से समझायें आखिर ये पहेली क्या है?
लावण्याः अरे ये किसीने गीत की तुकबँदी रच डाली है ..बेचारे मर्द क्या जानेँ ६ वार की साडी या कभी ९ वारी साडी को लपेटना क्या होता है!
” सारी इज़ अन आर्ट , व्हेर अ फीमेल बीकम्ज़ एन आर्ट व्हेन शी वेयरज़ साडी ! ”
पर सच कहूँ तो नारी की शोभा सबसे ज्यादा साडी मेँ ही निखरती है ! कहाँ से स्त्री की शारिरीक सुँदरता शुरु होती है और कहाँ साडी उस सौँदर्य को उभारती है उसे पृथक्क करना कठिन है इसिलिये तो आँचल जैसे शब्दोँ का अन्य भाषाओँ मेँ पर्याय ही नहीँ मिलता !
दिये को साडी की ओट मेँ छिपाये ले जाती साँध्य सुँदरी हो या शिशु को आँचल से ढाँपे दूध पिलाती माँ या माँ का आँचल कसके थामे, स्कूल जाते नन्हे बहादुर बच्चे, या दीदी के आँचल से भोजन के बाद हाथ पोँछता भैया या बीमार देवर को अपने आँचल से पँखा झलती भाभी …है किसी अन्य तहजीब मेँ ऐसे द्रश्य ?
ये तो बस भारतीय स्त्री गरिमा की जीती जागती यशोगाथा है और समाज का इतिहास भी…. जहाँ किसी द्रौपदी के चीर हरण को सिर्फ श्री कृष्ण ही रोक पाते हैँ और बची रहती है नारी की अस्मिता अक्षुण्ण् .. और ..तब, बस गीत याद रह जाते हैँ ….
घुघूती बासुतीः यह भी क्या स्कूल में पढ़ाया जाता था? हमें तो सस्ते में निपटा दिया हमारे अध्यापकों,अध्यापिकाओं ने!किसी ने यह पढ़ाया ही नहीं। मैं स्कूल से फीस वापिस करने को कहूँगी।
वैसे यह साड़ी और नारी की समस्या में कौन किससे अधिक परेशान है, नारी साड़ी से या साड़ी नारी से पता नहीं। अपनी कहूँ तो मैं साड़ियों से व साड़ियाँ मुझसे परेशान हैं और हम दोनों से परेशान है हमारा धोबी। उसे ६ मीटर को इस्तरी करना पड़ता है, मुझे उसे लपेटना पड़ता है और उन्हें मुझे अपने में लपेटना पड़ता है। सो सभी इस साड़ी की लपेट में आ जाते हैं। हाँ मुझ जैसी गृहणी के साड़ी पुराण के लपेटे में पति भी आ जाते हैं, उन्हें साड़ियाँ खरीदनी व उपहार देनी पड़ती हैं। यदि आप यह अंग्रेजी वाली बिच की बात कर रहे हैं तो साफ बता दूँ कि हमारी अंग्रेजी वाली बिच को साड़ी से कोई प्यार नहीं था। प्यार तो मुझे भी नहीं है। यह तो एक बिनसिला कपड़ा उस जमाने की निशानी है जब सिलाई मशीन का आविष्कार नहीं हुआ था और न ही जिम का। उस जिम नामक पुरुष की बात नहीं कर रही मैं। वह वजन घटाकर साड़ी के अलावा भी किसी भी सिले वस्त्र में समाने में सहायता करने वाला जिम। सो साड़ी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि ४० किलो से कम वजन वाली बिटिया या प्रियतमा के लिए खरीदो और वह ७० किलो की होकर भी पहनकर इतरा सकती है। क्या धोती (जो साड़ी का ही गरीब चचेरा भाई है)के सिवाय कोई और वस्त्र आप ३० या ४० किलो वजन बढ़ाकर भी पहन सकते हैं?
हमारी टिप्पणीः घुघूती जी, हमारे ख्याल से ये किसी अलंकार का उदाहरण था, उस अलंकार का हिन्दी नाम तो याद नही लेकिन वो कन्फ्यूजन या भ्रम टाईप के लिये होता है। हिन्दी के मास्टर मास्टरनी शायद सही नाम बता पायें, अगर वो इसे पढ़ेंगे तब।
प्रश्न ३: दूसरे एपिसोड के खिलाड़ी पंगेबाज, पंगा लेना चाहते हैं ये पूछकर कि “सिंदूर का रंग लाल कयो होता है हरा क्यो नही?”
लावण्याः शुक्रिया पँगेबाज जी
,सिँदुर का रँग लाल होता है क्यूँकि अन्य सारे पुरुष, उसे देखेँ तो सही पर दूर ही रुक जायेँ - वो भी अदब से !:) और सिँदुर बनता है गँधक जो कि स्त्री तत्त्व है , पार्वती का स्वरुप है उसके पारे यानि कि शिव तत्त्व के पौरुषेय से मिलन को सिँदुर कहते हैँ और यही सुहागिन का प्रतीक बना हमारे समझदार ऋषि मुनियोँ का सार — और हर नारी के लिये प्रसाद !आज २१ वीँ सदी मेँ, नारी सिँदुर लगाये या ना लगाना चाहे ये सर्वथा दूसरी बातेँ हैँ ..पर आशीर्वाद , आज नहीँ सदियोँ पहले मिल चुका है
घुघूती बासुतीः अब पंगेबाज हैं तो पंगा तो लेंगे ही ! वैसे आपको हम यह बता दें कि हमने उन्हें नेट पर जहाँ जहाँ नाम बँटते हैं हर उस जगह पर जाकर पंगेबाज नाम को हथिया लेने की बढ़िया सलाह दी थी। शायद उन्हें याद हो। अरे, मुझपर गुस्सा होकर आलू प्याज फेंकने ही हैं तो बड़े साइज के फेंको। मैंने तो केवल नाम हथियाने की सलाह दी थी, पंगे, वह भी हमसे,लेने की सलाह नहीं दी थी।
भाई पंगेबाज,यह सिन्दूर के रंग का रहस्य तो हमें भी पता नहीं। सिन्दूर लाल तो कतई नहीं होना चाहिए। आपने क्या कभी सिन्दूरी रंग नहीं देखा? वह लाल नहीं हनुमान जी के रंग का होता है। बिहार में मैंने बहुत सी स्त्रियों को उस रंग का असली सिन्दूर लगाते देखा है। यह लाल रंग का सिन्दूर तो मुझे बंगालिनों की कोई चाल नज़र आता है। शायद कुछ अधिक ही राजनीति से प्रभावित होकर उन्होंने लाल रंग का सिन्दूर प्रचलित कर दिया। क्या नाम है वह बड़ी बिंदी वाली कम्यूनिस्ट बहन का(वृंदा कारत),उनसे पूछना पड़ेगा।
वैसे यह पुरुषों की कोई गहरी चाल ही मुझे लगती है जो स्त्रियों पर लाल सिंदूर थोप दिया। देखिये ना कितने होशियार है। लाल सिन्दूर देखकर कोई भी भाई किसी विवाहिता पर अपना समय बर्बाद न करे,इसलिए लाल झँडी सा हमारे सिर पर रख दिया। पुरुषों के भाईचारे की इससे बड़ी मिसाल कोई नहीं मिल सकती। अब यदि हरा होता तो सभी सोचते कि हरी बत्ती जल रही है और अपना अमूल्य समय अविवाहिताओं पर ही ना लगाकर विवाहिताओं पर भी बर्बाद करते।
मेरा वश चले तो मैं तो चाहती कि पुरुष भी सिन्दूर से मांग भरें। परन्तु इसमें कुछ प्रैक्टिकल कठिनाइयाँ हैं। विवाह तक तो जैसे तैसे पुरुष अपने बाल किसी तरह दवा आदि खाकर,बत्रा क्लिनिक जाकर, सहेज कर रखते हैं, परन्तु एक बार शादी हुई नहीं कि फिर गंजेपन से कोई परहेज नहीं। सो जिनका सारा सिर ही एक मांग में परिवर्तित हो गया हो वह सिन्दूर भला कहाँ भरेगा?
प्रश्न ४: अच्छी ही नही बल्कि लंबी लंबी बातें (पोस्ट) बनाने वाले फुरसतिया यानि अनुप जी का सवाल है कि “आपको कैसे पति/आदमी /पसन्द हैं अच्छा खाना बना लेने वाले या अच्छी बातें बना लेने वाले?”
लावण्याः अनुप जी - शुक्रिया, अगर इन दो बातोँ को ध्यान मेँ रखती तब तो दीपक , जो मेरे पति हैँ , उनको कैसे पसँद करती ?
ना ही वे खाना बनाते हैँ नाही लँबी बातेँ ही बनाते हैँ
एक अच्छे पति का, मेरे मत मेँ , सबसे पहले, एक अच्छा और सँवेदनाशील इन्सान होना ज्यादा जरुरी है।
घुघूती बासुतीः अरे,यह भी कोई पूछने की बात है। बिल्कुल अच्छी बातें बना लेने वाले ही पसन्द हैं। खाना बनवाने के लिए तो हम अच्छी बातें बना लेने वाले से अच्छी बातें बनाकर खानसामा भी रखवा सकते हैं परन्तु अच्छा खाना बनाने वाले से अच्छी बात बनाने वाला तो नहीं रखवा सकते न!
प्रश्न ५: उड़नतश्तरी यानि समीर जी को तो अभी तक नही मिला लेकिन ये जानना चाहते हैं, “यदि आपको जिन्न मिल जाये और एक वर (वरदान) मांगना हो, तो क्या मांगियेगा और क्यूँ?”
लावण्याः शुक्रिया समीर भाई - भई व्व्वाह!! …कमसे कम..इस एपिसोड खेलने मेँ ऐसा प्रश्न मिला जिससे कुछ पल के लिये ही सही, ऐसी दुनिया मेँ खो गयी जहाँ कोयी दुखी, भूखा, प्यासा या लाचार नहीँ ..सब तरफ बस खुशियाँ ही खुशियाँ हैँ ..बिलकुल जैसे आप हँसानेवाली पोस्ट लिखते हैँ उसे पढकर खुलकर हँसी आती है वैसे! मैँ जिन्न से ऐसी दुनिया का सच होना माँगूँगी ….” वो सुबहा कभी तो आयेगी ………वो सुबहा कभी तो आयेगी “………………
घुघूती बासुतीः ‘मिल जाए तो’ का क्या मतलब? हमें तो यह जिन्न ३० साल पहले ही मिल गया था। जब हमारा कन्यादान हुआ था तो आप क्या सोचते हैं हम बस दान ही हुए चले जा रहे थे ? अरे भाई मेरे, हमें जब ‘वर’ दान मिला तभी तो हम दान हो गए। अन्यथा क्या ऐसे ही दान में अपना बलिदान कर देते? अब देखिए ना उस जिन्न ने कैसा वर दिया कि आज तक हम मांगे चले जा रहे हैं और ‘वर’ हमें देता ही चले जा रहा है। यह कम्प्यूटर जिसपर हम ठकाठक अक्षरों को टंकणाएँ जा रहे हैं, यह नेट का कनैक्शन, कोई जिन्न थोड़े ही दे गया है, वह तो बस ‘वर’ दे गया था और हम वर माँगते जा रहे हैं उस ‘वर’ से जिससे हमने स्वयंवर रचाया था। अब ऐसे ‘वर’ के होते और क्या वरदान चाहिए?
तो ये था इन दो धुरंधरों महिला चिट्ठाकारों के सवाल जवाब का सिलसिला, आशा है आपको मजा आया होगा।
अब आप भी अगर इसमें हिस्सा लेना चाहते हैं तो टिप्पणी में वही ईमेल छोड़िये जिसे आप रेगुलर चेक करते हैं और उसके बाद हमारी मेल का करिये इंतजार क्या पता अगले एपिसोड में आप का ही नंबर हो।
Popularity: 23% [?]
Posted in आमने-सामने
14 Comments »
July 2, 2008 | Tarun
आमने सामने के दूसरे एपिसोड में आज एक दूसरे के आमने सामने हैं पंगेबाज और दुर्योधन की डायरी वाले शिवकुमार मिश्रा। आप में से बहुत सोच रहे होंगे कि पहला एपिसोड कब आया, और ये है क्या बला। आमने-सामने के बार में जानने के लिये यहाँ क्लिक कीजिये और इसके पहले एपिसोड के लिये जो १ साल पहले हमने पोस्ट किया था या खेला था उसके लिये यहाँ क्लिक कीजिये जिसमें आमने-सामने थे फुरसतिया और उड़नतश्तरी।
अब शुरू करते हैं एपिसोड २ -
प्रश्न १: “अक्ल बड़ी या भैंस”, इसे बहुत सुनते आये हैं। आप बताईये कौन बड़ा और क्यों?
शिवकुमारः सालों तक बुद्धिमान लोगों ने गुमराह कर के रखा। हम तो यही मान के चलते रहे कि अक्ल और भैंस में अक्ल बड़ी है, हम क्या करते? हमारे गुरुजनों ने हमें यही बताया. हम भी मानते रहे, और तब तक मानते रहे जब तक अक्ल नहीं आई। जब अक्ल आई तो पता चला कि अक्ल भैंस को मैच नहीं कर सकती। आख़िर भैंस इतनी विशालकाय वो भी सींग के साथ. आराम से दिखाई देती है। इतनी बड़ी कि बाँध कर रखने की जरूरत पड़ जाती है। जब इच्छा हो, किसी को भी दौड़ा ले।
वहीँ अक्ल का कोई निश्चित स्थान नहीं, किसी की अक्ल घुटनों में, किसी की पंजों में। किसी-किसी की तो जीभ पर। कई बार डॉक्टर जैसा प्राणी भी निश्चित नहीं कर पाता कि अक्ल मिलेगी कहाँ। वैसे भी घुटनों और पंजों में रहने वाली अक्ल कितनी छोटी होगी, आप अंदाजा लगा सकते हैं। एक बात और…..छोडिये न, भैंस बड़ी होती है।
पंगेबाजः बडी तो भैस ही होती है वरना भैस पर बैठ कर चारे खाते खाते लालू जी यू ही संसद मे ना पहुचे होते। “काली काली भैस हमारी देती दूध सफ़ेद, पहले तो हमें आप बताये क्या है इसका भेद” तभी हम इसके अगले खंड पर रोशनी डालने के बारे मे अपने रोशन खयालात जाहिर करेंगे।
प्रश्न २: इन दोनों में से पहले किससे बचना चाहेंगे - तमिल टाईगर या बंगाल टाईगर, और उससे पहले बचने का मुख्य कारण
शिवकुमारः तमिल टाईगर और बंगाल टाईगर में से अगर बचने की बात है तो भइया हम तो तमिल टाईगर से बचना चाहेंगे। भारत से लेकर श्रीलंका तक सब उनसे बचना चाहते हैं। ऐसे में हम अपनी बहादुरी लेकर क्या कर लेंगे? वैसे भी बंगाल टाईगर आजकल ख़ुद ही मनुष्यों से बचने में लगा है। उससे मुझे कैसा डर?
पंगेबाजः क्या मतलब हम आपको कही से डरपोक दिखते है? आपने ये सोचा ही कैसे कि हम डरेगे और जब डरेंगे नही तो बचने का सवाल टाईगरो से जाकर पूछिये जी, हमसे तो जो भी पहले पंगा लेगा मरेगा, सिरे से ही गलत सवाल है जी ये, अगला पूछिये?
प्रश्न ३: अगर ब्लोग या ब्लोगर नाम की चीज नही होती, तो आप उस टाईम का उपयोग कैसे करते जिसे आप चिट्ठे लिखने या पढ़ने में बिताते हैं।
शिवकुमारः बड़ा कठिन सवाल कर दिया आपने। कठिन इसलिए कि हमें पता ही नहीं कि समय का उपयोग होता क्या है। ज्यादातर बार समय ही हमारा उपयोग करके आगे बढ़ जाता है और हम टापते रह जाते हैं। फिर भी आपने पूछा है तो हम आपको बताएँगे, ‘सिटिजन जर्नलिस्ट’ बन जाते जी। आजकल टीवी न्यूज़ चैनल पर सिटिजन जर्नलिस्ट की बड़ी डिमांड है। वैसे ख़ुद को सिटिजन जर्नलिस्ट बनने में असमर्थ पाते, तो रियलटी शो में गायक बनने की तैयारी करते। समय का इससे अच्छा ‘उपयोग’ हमें दिखाई नहीं देता।
पंगेबाजः भाई धंधे में लगाते, अब भी वही से समय निकालते है आप सब से पंगा लेने मे और आपके लिये पंगो को देखने मे। अगला सवाल?
प्रश्न ४: एपिसोड १ में इसे खेलने वाले महारथी अनुप जी का सवाल है - अरुषि हत्याकांड की गुत्थी अगर सुलझ गयी तो मीडिया क्या करेगा?
शिवकुमारः भगवान से शिकायत। भगवान से मीडिया शिकायत करते हुए कहेगा, “हमारी जरा सी खुशी से आप झाल-भुन गए? क्या किया ये? सीबीआई से मामला सुलझवा दिया। सीबीआई हमसे गुमराह नहीं हो सकी, लेकिन आप तो उन्हें गुमराह कर ही सकते थे। आप के ऊपर से विश्वास चला गया हमारा। छि, ऐसा कोई करता है क्या? अच्छा, कोई बात नहीं। अब इस हत्याकांड की गुत्थी सुलझ ही गई है तो कोई नया हत्याकांड करवाईये न, प्लीज।”
वैसे मीडिया से ज्यादा दुखी हम चिट्ठाकार होंगे। जब तक मामला नहीं सुलझ रहा है, आरुषी के कत्ल के ऊपर कविता से लेकर ‘इन्वेस्टिगेटिव ब्लागिंग’ तक, सबकुछ कर रहे हैं।
पंगेबाजः ये लो जी फ़ुरसतिया जी ने इत्ती फ़ुरसत निकाल कर भी स्वाल पूछा, वो भी ऐसा? बेचारे फ़िर से कही नाग नागिन भूत झाड फ़ूक, पुरानी हवेली ढूढने निकल जायेगे, भला हो सीबी आई वालो का, कुछ दिन तो राजधानी मे रहने दिया बेचारों को।
प्रश्न ५: एपिसोड १ के ही दूसरे महारथी समीर जी पूछते हैं - मन ही मन में ऐसा मान लिजिये कि आपकी आयु २५ वर्ष है और आपकी प्रेमिका शादी करने के लिए शर्त रखती है कि या तो ब्लॉगिंग या मैं…आप किसको चुनेंगे और क्यूँ?
शिवकुमारः मन ही मन में मानने की बात है। हमने आँखें बंद कर के मन ही मन माना। बड़ा मजा आया, मजा इस बात से कि हम २५ साल के हो गए हैं। उससे भी ज्यादा मजा इस बात पर कि हम शादी-शुदा नहीं रहे। समीर भाई, क्या मन वाला सवाल पूछा है आपने। मन तो करता है कि आपका मुंह लड्डुओं से भर दूँ। लेकिन आप तो कनाडा में हैं, क्या करुँ? मेरी विनती मानिए और मन ही मन लड्डू खा लीजिये।
वैसे मैंने मन ही मन में प्रेमिका के शर्त के बारे में सोचा तो लगा कि जब एक बार वापस २५ साल के हो ही गए हैं तो शादी करने की जरूरत क्या है? वो भी तब जब शादी के बारे में जान गए हैं। लेकिन अगर प्रेमिका ऐसी शर्त रख भी देती तो हम ब्लागिंग को चुनते। कारण यह कि ब्लागिंग में चिठेरा के साथ-साथ चिठेरी भी है। क्या पता कोई चिठेरी प्रेमिका बन बैठे तो फिर ब्लागिंग छोड़ने की शर्त भी नहीं रहेगी।
पंगेबाजः समीर भाई हम आपको ऐसा नही समझते थे, ये आप हम से किस बात का बदला ले रहे है, आप हम से कह रहे है समझलो काहे जी काहे समझले? हम तो पिछले पंद्रह सालो से ही अपने को चौबीस का समझ ही रहे है और हम अभी अगले दो तीन साल तक २५ के नही होने वाले है। प्रेमिका से तुरंत मिलवाईये हम अभी और इसी वक्त ब्लोगिंग को अलविदा कह देंगे इसमे चुनने की क्या बात है जी। ये ब्लोगिंग फ़्लोगिंग बुढापे के चोचले है जी। ज्ञान जी हुये, आप हुये, मसीजीवी जी, आलोक जी, फ़ुरसतिया जी हुये, ये आप सब लोगो की उम्र का कार्य है जी हम तो वैसे ही यहाँ आप लोगो का मन रखने के लिये आ जाते हैं।
तो ये था इन दो धुरंधरों के सवाल जवाब का सिलसिला, आशा है आपको मजा आया होगा।
अब आप भी अगर इसमें हिस्सा लेना चाहते हैं तो टिप्पणी में वही ईमेल छोड़िये जिसे आप रेगुलर चेक करते हैं और उसके बाद हमारी मेल का करिये इंतजार क्या पता अगले एपिसोड में आप का ही नंबर हो।
Popularity: 26% [?]
Posted in आमने-सामने
9 Comments »
December 29, 2007 | saheli
कितना प्यारा होता हैं बचपन
कितना मासूम होता हैं लड़कपन
सच् होता हैं मन जैसे दर्पण
सबसे अलग भी उनका हद्पन (Hadhpan)
अधूरा हैं जीवन इनके बिना
उनके लिए जिए वही हैं जीना
सब कुछ भी जो गया अपना छीना
बच्चे हैं जो साथ तोह पास हैं नगीना
बस एक ही प्रार्थना हैं भगवान् से
अपना रास्ता चुने वो सच्चाई से
भटके न कदम दुनिया की चकाचोंध से
बचाके रखे उन्हें हर आनेवाली मुश्किल से
Popularity: 58% [?]
Posted in कविता और गीत
1 Comment »
August 31, 2007 | saheli
कितनी अजीब बात हैं आज के इस दौर मे शादी पति-पत्नी के बीच का एक अटूट रिश्ता न रहकर तलाक के कागजो पर एक-दुसरे के हस्ताक्षर बनकर रह गए हैं ! कोई एक-दुसरे को समझना ही नही चाहता या फ़िर पुरी कोशिश करने से पहले ही हार मान लेना चाहते हैं ! और या कहो ये एक फैशन सा बन गया हैं अब वेस्टर्न देशो की तरह ! ज्यादा तर सभी तौर - तरीके अपना लिए हैं हम लोगो ने उनके, तो फ़िर शादी और तलाक के मामले मे क्यों पिछे रहे ? शायद यही सभी के सोचने का नजरिया हो गया हे अब !
आज जब भी अपने इर्द-गिर्द देखती हूँ तो यही पाती हूँ की कोई न कोई शादी-शुदा दम्पति अपने गृहस्थ जीवन मैं खुश नही हैं और अपने आप को अकेला मेहसूस कर रहा हैं ! झगड़े तो सभी के होते हैं पर आमतौर पर उन्हें खत्म किए जाते हैं, एक-दुसरे की पसंद-नापसंद का ख्याल रखा जाता हैं, जरूरत पडने पर समझौता करना पडता हैं ! तो फ़िर अचानक ये सब क्यों काम नही आ रहा हैं ? हमारे माता-पिता और उनसे पहले के लोग वे सभी इस बात का सबूत हैं की शादी गाड़ी के दो पहिये की तरह हे साथ मिलकर ही चल सकते हैं ! मगर आज की नारी अपने आप को कम नही समझना चाहती और कुछ पति अपनी पत्नियों को बराबर का दर्जा नही देना चाहते ! इस झोड़ मे वे एक-दुसरे को बस नीचा दिखाना चाहते हैं !
उन्हें लगता हे की वे दुसरी शादी से खुश रहेंगे पर अगर उनकी सोच वही हैं और उनके अन्दर अपने प्यार और रिश्ते के लिए थोड़ी भी झुकने की क्षमता नही हैं तो फ़िर वे किसी भी शादी को लेकर खुश नही रह सकते हैं ये मेरा दावा हैं ! जिंदगी बस यूँ ही शादी और तलाक के बिच झूलती नजर आएगी ! और फ़िर कब एक दिन अचानक जिंदगी की शाम ढल जायेगी उन्हें पता भी नही चलेगा !
Popularity: 77% [?]
Posted in सामान्य
7 Comments »
June 19, 2007 | Kuhu
कल रात थी बहुत हसीन
समां था कुछ ज़्यादा ही रंगीन।
अचानक वो मिले कुछ ऐसे मोड़ पर
जा बैठी पहलू में, सब कुछ छोड़कर।

मुद्दतों बाद हुई थी मुलाक़ात
कुछ कहने सुनने की नहीं थी बात
बस आंखों से जाम पिए जाते थे
और उनका नाम लिए जाते थे।
वक़्त से कुछ लम्हे चुराए मैंने
और समेटकर दिल में बसाये मैंने।
फ़िर न जाने कब हो मुलाक़ात
वक़्त का तकाज़ा भी तो था साथ।
कितने अमावसों के बाद
कल आयी थी पूनम की रात।
हसीन पल और अनकही हसरतों से
भरा नहीं मन छोटी मुलाकातों से।
वादा लिया है अगली मुलाक़ात का
पर यकीन नहीं उनकी किसी बात का।
नाउम्मीद हो चली थी मैं,
लेकिन कल कैसी खिली थी मैं ।
Popularity: 100% [?]
Posted in कविता और गीत
5 Comments »
May 16, 2007 | saheli
दिन् रात् उनको याद् करके रोते हे !
कि जब् से उनसे हमको प्यार् हो गया !!
जुबा के बोल् का अब् मोल् क्या हे !
कि जब् आनखो से सब् इझार् हो गया !!
किसि चिज् को देखने कि दिल् मे चाहत् नहि हे !
कि जब् से उनका बस् दिदार् हो गया !!
दुनिया जहान् कि बातो से अब् घबराते नहि हे !
कि जब् से उनपे रबसा एतबार् हो गया !!
बिन् उनके दो कदम् भि चलना मुमकिन् नहि हे !
कि जब् से उनका बस् उनका इन्तज़ार् हो गया !!
Popularity: 90% [?]
Posted in कविता और गीत
2 Comments »